कविता - तुझ में सबकुछ
खोए हुए अपने आपको पा ले
खुश रहने के लिए हर कदम बढा ले
ना जाने कितनी बार भौतिक चिजों के
पीछे भागा तू
ना जाने कितनी बार लोगों को टटोला तुमने
तुम सब में बसे हुए
तुम ही ज्ञान की मुरत
तुम खुद्द ही मनपर काबू
पानेवाले
तुझ में बसी हर सांस को
जन्म मृत्यू से पार करानेवाले
जिम्मेदारीयोंने घेरा तुम्हे
हां लेकिन इन्ही जिम्मेदारीयों से सिखा तुमने
है तुझमें क्षमता जिम्मेदारीयां निभाने की
है तुझमें क्षमता जरूऱतो को कम करने की
अपने मन और बुद्धि को लेकर
वर्तमान में जी ले तू
तुझपर यह हावी होने से पहले ही
बन जा इनका मदारी तू
अपने से हुई गलती को सुधार
अपने आप तू
ना खड़ा रह कटहरे में
ना दे किसीको सफाई तू
क्या झूठ? क्या सच?
क्यों तोले अपने आपको तू ?
क्या मिथ्या? क्या साया?
क्यों न जाचें स्वयंम को तू ?
सबका कर स्वीकार तू
नहीं तेरे जैसा कोई यह जान तू
पाई हुई हर एक चोट को बारबार
क्यों रोंदे तू !
छोडकर हर मेल मुटाव
क्यों ना बने शांतीदूत तू
तुझमें बसी पूरी कायनात
तुझमें बसी शक्ती
अपने ही हुंकार से
कर दे भय का नाश तू
क्यों भागे पगले
क्यों पिछा छुडाए
तेरे ही अपने बेशर्त प्यार करनेवाले
बिना जाने हिरे को
पत्थर समझ क्यों ठुकराए तू?
कृतज्ञता से सभीको धन्यवाद दे तू
इतना पाएगा विश्वास न रख पाएगा
जो मांगेगा हर घड़ी पाएगा
तू शक्ती तू ही भक्ति
तुझमें छुपी सृष्टि
हर घड़ी बदलती जिंदगी
क्यों अपनी ही जिन्दगी अपने हाथों से कुचलें तू?
बचपन बीता बीती जवानी बुढ़ापे में सोचें तो?
कैसी कटी यह यात्रा पहिएवाली
सब कुछ इतना मीथ्या था
मैं कितना अज्ञानी था
सब मोहमाया था
फिर भी मैं उस में डूबता था l
अस्सी साल की उम्र में
तुझे जीने की चाह है
जिंदगी समझ आई
तब यमराज तेरे पास है l
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